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क्यो भ़ारतीय ही भारत की छवि गंदा करने पर आमादा हैं.
26 November,2012
वो कारों का भुकतान तो करते हैं, परंतु सफाई के मामले मे देश के साथ सौतेला व्यवहार ही अपनाते हैं.

देश की राजधानी दिल्ली के अन्तराष्ट्रीय हवाई अड्डे एवं  अन्य कुछ जगहों को देख कर तो यही लगता है कि इस देश का काफी विकास हो चूका है, देश तरक्की पर है। लेकिन सवाल यह है की क्या वास्तव में हम तरक्की के सही मायने समझ पाए है? इसमें कोई संदेह नहीं की आजादी के 61 साल बाद देश की तस्वीर बदल चुकी है, इन्फ्रास्ट्रक्चरल विकास एव  बुनियादी सुविधाओं की बेहतरी ने लोगों के जीवन अस्तर को बेहतर बनाया है। लेकिन इस विकास क्रम में हमारा कितना और किस तरह का योगदान है, इस पर   विचार करना बहुत आवश्यक है । हम  कई प्रकार के कर देते हैजिसका उपयोग सरकार हमारे विकास के लिए करती है ,नागरिक सुबिधाओं को बेहतर बनाती है । लेकिन इसे बिडम्बना ही कहेंगे की अपने ही  पैसे से निर्मित सार्वजानिक संपत्ति का हम सम्मान नहीं करते हैं। अब सड़क को ही लीजिये,देश की राजधानी दिल्ली की शानदार सड़को पर यहाँ वहां कचड़ा विखरा हुआ देखने को मिल जायेगा ,कार से सिगरेट, रैपर , कोल्ड्रिंक कंटेनर आदि  फेंकते हुए लोग अक्सर दिख जाते हैं । क्या इन्हें शिक्षित कहा जा सकता है? फुटपाथ पर गोबर, भिखारिओं का जमावड़ा, ठेले और सब्जी वाले इस कदर कब्ज़ा जमाये हुए हैं फुटपाथ का कोई दुसरा इस्तेमाल गौड नजर आता है ।  हालाँकि यह हर देशवासी  की जिम्मेदारी बनती है की वो सडकों को साफ सुथरा रखें लेकिन यदि किसी को इस तरह की सलाह दी जाती है तो वो या तो नाराज हो जाता है या बात को हंसी में उड़ा देता है । और अपनी गलती छुपाने के लिए सारा दोष सरकार  पर मढ़ देते हैं । सबसे अधिक गन्दा बातावरण तो पुरुष समाज ने ही किया है , जो जगह-जगह पर सु सु -सू  कर देते हैं। चाहे वो दिवार हो, मलवे का ढेर हो, पेड़ हो या सड़क का किनार कही भी ये टायलेट करने से हिचकते नहीं है । जब मेरे एक विदेशी मेहमान ने मुझसे पूछा  कि क्या इन लोगो के लिए इस देश में कोई कानून नहीं है, तो मेरे पासा हंसने के सिवा  कोई जबाब नहीं था । यह कहना भी गलत होगा की इस देश में टायलेट की कमी है,कई बार यह देखने को मिलाता है की पास में टायलेट होने के बावजूद लोग उसका इस्तेमाल नहीं करते हैं । कईयों का कहना है की यूरिन एक प्राकृतिक उर्बरक है और सयंत्रो के लिए अच्छा है, शायद उन्हें यह पता नहीं है की भारत में यूरिन का उपयोग खाद बनाने के लिए नहीं किया जाता है । इस तरह की सोच दुर्भाग्यपूर्ण है । यहाँ नियमो का उलंघन एक आम बात है , ऐ सा भी नहीं है की लोग कानून से अनभिज्ञ हैं , लोग तो इस तरह की गलतियाँ जानबूझ कर करते हैं । जाहिर है जबतक लोगों की मानसिकता में परिवर्तन नही  आयेगा सुधर असंभव है । सरकार आखिर क्या-क्या करे , जब लोग ही सुधारना नहीं चाहते तो सर्कार क्या कर लेगी । अपनी सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वभर में मशहूर भारत की छवि ऐसे ही कृत्यों से धूमिल होती है। जरुरत है , आम जागरूकता की , सम्बेदंनशिलता की और देश के प्रति अपनी जिमेदारियों को समझने की।भारत को भारत बनाना हमारे हाथ में है, हम नहीं सुधरेंगे तो देश कत्त्ई  नहीं सुधर सकता । 

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