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सौदे करें कि न करें ?
Naradvani | 16 Oct 2008

HINDI VERSION---

 

सौदे करें कि न करें ?
Naradvani


अक्सर मेरी चर्चा लंबी अवधि के निवेशकों की ओर झुकी होती है। लेकिन ऐसा नहीं है कि छोटी अवधि के सौदे करने को मैंने बुरा मान रखा है। बस इतनी सी बात है कि आपको पहले से अपने स्वभाव और जोखिम उठाने की क्षमता के हिसाब से यह तय करना होगा कि आप सौदे करने जा रहे हैं या निवेश करने। बाजार में अक्सर यह होता है कि आप निवेश करने के इरादे से की गयी खरीदारी को अगले चंद दिनों में घबराहट या लालच में फटाफट निपटा देते हैं और वास्तव में निवेशक से कारोबारी बन जाते हैं। इसी तरह अगर सौदे में घाटा हो रहा हो तो सोचने लगते हैं कि चलो इसे लंबे समय के लिए रख लेते हैं। यानी करने चले थे छोटी अवधि का सौदा, लेकिन मजबूरी में बन गये निवेशक!
सौदे करते समय दूसरी बात यह तय कर लें कि आपको किसकी राय पर चलना है। अगर कोई एक विश्लेषक या सलाहकार आपने चुन रखा है जिसकी सलाह पर आपको पूरा भरोसा है, तब उसकी बातों को पूरी तरह से मानें। लेकिन अक्सर होता यह है कि लोग सौदे करते हैं सलाहकार की राय से, लेकिन उसके बाद की रणनीति में अपनी समझ की खिचड़ी डाल देते हैं। वैसे में सौदा गलत जाने पर आपका सलाहकार तो एकदम से पल्ला झाड़ लेगा। वह अपनी जगह सही होगा, क्योंकि आपने उसकी पूरी बात तो सुनी नहीं।
दूसरा रास्ता यह है कि सुनें सबकी और करें बस अपने मन की। लेकिन इस रास्ते पर चलने से पहले खुद को ठोक-बजा लें। असली सौदे करने से पहले अगर कुझ समय तक मॉक ट्रेडिंग यानी बिना खरीदे-बेचे केवल कागजी अभ्यास कर लें तो आपको यह पता चल जायेगा कि आप सही रास्ते पर हैं या नहीं।
सौदों की इस दुनिया में भी आपको हर वक्त अलग-अलग तरह की राय मिलती रहेगी। एक ही समय में कोई विशेषज्ञ बाजार से एकदम दूर रहने की सलाह देगा, तो कोई दूसरा विशेषज्ञ सौदों के कई सुनहरे मौके गिनाता दिखेगा। लेकिन आपके सामने रास्ते केवल दो ही हैं। या तो एक सलाहकार चुन कर पूरी तरह उसकी राय पर चलें, या फिर अपने कौशल को इतना मांज लें कि आप सबकी सुन कर खुद अपना फैसला ले सकें।
लेकिन दोनों ही रास्तों में सबसे महत्वपूर्ण बात है अपने जोखिम को संभालने की। कभी किसी सौदे में इतना बड़ा जोखिम न लें, कि दांव उल्टा पड़ने पर आप बाजार से ही बाहर हो जायें।
राजीव रंजन झा